International Marketing BCom 4th Semester Guide Pdf | Download Now

अन्तर्राष्ट्रीय बाजार | BCom Semester 4 | Complete Notes Hindi
वाणिज्य संकाय  |  चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम 2024–28  |  सेमेस्टर चतुर्थ
BCom • Group–03 विपणन • COCI–02

अन्तर्राष्ट्रीय बाजार
सम्पूर्ण नोट्स

चारों इकाइयों का विस्तृत हिन्दी विवरण — परिभाषा, उदाहरण, और परीक्षा उपयोगी तथ्यों सहित

🌍 International Marketing 📦 Product Planning 💰 Pricing 📣 Promotion 🇮🇳 EXIM Policy 60 कालखंड
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कोर्स परिचय

कोर्स कोड

COCI–02

सेमेस्टर

चतुर्थ 2024–25

क्रेडिट

4 (60 घंटे)

अधिकतम अंक

100

उत्तीर्णांक

40 अंक

कोर्स प्रकार

DSE विपणन

कोर्स लर्निंग आउटकम (CLO)

📌 इस कोर्स को पढ़ने के बाद विद्यार्थी सीखेंगे:

  • कई विदेशी देशों में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार और ग्राहकों की जरूरतों को समझना।
  • निर्यात–आयात नीति की व्याख्या करना और निर्यात व्यवसाय की समझ विकसित करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय मूल्य निर्धारण और तरीकों का मूल्यांकन करना।
  • विज्ञापन एवं व्यक्तिगत विक्री के लिए अन्तर्राष्ट्रीय विपणन कौशल विकसित करना।
  • किसी भी समाज के आर्थिक विकास पर अन्तर्राष्ट्रीय विपणन के प्रभाव का विश्लेषण करना।

इकाई 1 — 15 कालखंड

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अन्तर्राष्ट्रीय विपणन: परिचय, वातावरण एवं बाजार चयन
⏱ 15 कालखंड  |  घरेलू विपणन vs अन्तर्राष्ट्रीय विपणन  |  बाजार प्रवेश माध्यम
अन्तर्राष्ट्रीय विपणन की परिभाषा, प्रकृति एवं क्षेत्र

अन्तर्राष्ट्रीय विपणन (International Marketing) वह प्रक्रिया है जिसमें कोई कंपनी या संस्था अपने उत्पाद और सेवाओं को एक से अधिक देशों में बेचती है। जब विपणन की गतिविधियाँ राष्ट्रीय सीमाओं को पार करती हैं, तो उसे अन्तर्राष्ट्रीय विपणन कहते हैं।

Philip Kotler के अनुसार: "अन्तर्राष्ट्रीय विपणन एक से अधिक देशों में मार्केटिंग गतिविधियों को करना है।" Warren Keegan के अनुसार: "यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कंपनी की संपत्ति और क्षमताओं को वैश्विक बाजार के अवसरों से मिलाया जाता है।"

प्रकृति (Nature): अन्तर्राष्ट्रीय विपणन की प्रकृति जटिल है क्योंकि इसमें विभिन्न देशों की भाषाएं, संस्कृतियाँ, कानून, मुद्राएं और आर्थिक परिस्थितियाँ शामिल होती हैं।

क्षेत्र (Scope): इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है — निर्यात (Export), लाइसेंसिंग, फ्रेंचाइजी, संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सभी शामिल होती हैं।

महत्वपूर्ण अंतर: घरेलू विपणन में एक ही देश की सीमाओं में काम होता है, जबकि अन्तर्राष्ट्रीय विपणन में कई देशों की विभिन्न परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
घरेलू विपणन के विरुद्ध अन्तर्राष्ट्रीय विपणन

भाषा और संस्कृति: घरेलू बाजार में एक ही भाषा और संस्कृति होती है, परंतु अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अलग-अलग भाषाएं, रीति-रिवाज और उपभोक्ता व्यवहार होते हैं। उदाहरण — भारत में गाय का मांस नहीं बिकता, परंतु कई अन्य देशों में यह सामान्य है।

मुद्रा और विनिमय दर: अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) का जोखिम रहता है। रुपये और डॉलर की विनिमय दर में बदलाव से लाभ-हानि प्रभावित होती है।

कानूनी ढांचा: प्रत्येक देश के अपने आयात-निर्यात नियम, सीमा शुल्क (Customs Duty), और व्यापार प्रतिबंध होते हैं।

प्रतिस्पर्धा: अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में स्थानीय और वैश्विक दोनों प्रकार की प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।

अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण — आंतरिक एवं बाह्य

आंतरिक वातावरण (Internal Environment): इसमें कंपनी के संसाधन, उत्पादन क्षमता, वित्तीय स्थिति, प्रबंधन की दक्षता, और तकनीकी जानकारी शामिल होती है। ये वे तत्व हैं जो कंपनी के नियंत्रण में होते हैं।

बाह्य वातावरण (External Environment — PESTEL): राजनीतिक (Political), आर्थिक (Economic), सामाजिक (Social), तकनीकी (Technological), पर्यावरणीय (Environmental), और कानूनी (Legal) — ये छह कारक बाह्य वातावरण बनाते हैं।

उदाहरण: जब भारत ने GST लागू किया, तो इससे घरेलू और विदेशी दोनों कंपनियों के विपणन पर व्यापक प्रभाव पड़ा — यह बाह्य कानूनी वातावरण का उदाहरण है।
विदेशी बाजार की पहचान व चयन

किसी भी कंपनी के लिए सही विदेशी बाजार का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण निर्णय होता है। गलत बाजार चुनने से भारी नुकसान हो सकता है।

बाजार चयन के मानदंड: बाजार का आकार (Market Size), विकास दर, प्रतिस्पर्धा का स्तर, सांस्कृतिक समानता, और राजनीतिक स्थिरता।

चयन के तरीके: (1) Country Screening — देशों का क्रमबद्ध मूल्यांकन, (2) Market Research — प्राथमिक और द्वितीयक शोध, (3) Test Marketing — छोटे स्तर पर परीक्षण।

विदेशी बाजार में प्रवेश हेतु माध्यमों का चयन

(1) निर्यात (Exporting): यह सबसे सरल तरीका है। कंपनी अपने देश में उत्पाद बनाकर विदेश में बेचती है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष निर्यात दो प्रकार होते हैं।

(2) लाइसेंसिंग (Licensing): कंपनी अपनी तकनीक, ब्रांड नाम या पेटेंट का उपयोग विदेशी कंपनी को रॉयल्टी के बदले में करने की अनुमति देती है।

(3) फ्रेंचाइजी (Franchising): McDonalds, KFC जैसी कंपनियाँ इस मॉडल का उपयोग करती हैं। यहाँ पूरा व्यवसाय मॉडल साझा किया जाता है।

(4) संयुक्त उपक्रम (Joint Venture): दो देशों की कंपनियाँ मिलकर एक नई कंपनी बनाती हैं। जोखिम और लाभ दोनों साझा होते हैं।

(5) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): कंपनी विदेश में अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी स्थापित करती है। सर्वाधिक नियंत्रण परंतु जोखिम भी सर्वाधिक।

याद रखें: निर्यात → लाइसेंसिंग → फ्रेंचाइजी → JV → FDI — इस क्रम में जोखिम और नियंत्रण दोनों बढ़ते जाते हैं।

इकाई 2 — 15 कालखंड

2
उत्पाद नियोजन, मूल्य निर्धारण एवं भुगतान की शर्तें
⏱ 15 कालखंड  |  ब्रांडिंग, पैकेजिंग  |  Incoterms  |  Letter of Credit
उत्पाद डिजाइनिंग — मानकीकरण बनाम अनुकूलन

अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में उत्पाद रणनीति के दो विपरीत दृष्टिकोण होते हैं:

मानकीकरण (Standardization): एक ही उत्पाद को सभी देशों में बिना किसी बदलाव के बेचा जाता है। उत्पादन लागत कम होती है और ब्रांड की एकरूपता बनी रहती है। उदाहरण — iPhone पूरी दुनिया में लगभग एक जैसा होता है।

अनुकूलन (Adaptation): स्थानीय बाजार की जरूरतों और पसंद के अनुसार उत्पाद में बदलाव किए जाते हैं। McDonald's भारत में मैकआलू टिक्की बर्गर बेचता है — यह अनुकूलन का सर्वोत्तम उदाहरण है।

Glocalization: "Think Global, Act Local।" कंपनी की मूल पहचान वैश्विक रहती है, परंतु स्थानीय स्वाद के अनुसार उत्पाद में बदलाव किए जाते हैं।

परीक्षा टिप: Standardization में लागत कम होती है परंतु स्थानीय स्वीकृति कम हो सकती है। Adaptation में लागत अधिक होती है परंतु ग्राहक संतुष्टि अधिक होती है।
ब्रांडिंग, पैकेजिंग, लेबलिंग और गुणवत्ता

अन्तर्राष्ट्रीय ब्रांडिंग: ब्रांड नाम का चुनाव बहुत सावधानी से करना होता है। कुछ शब्द एक भाषा में अच्छे हों, परंतु दूसरी भाषा में उनका अर्थ आपत्तिजनक हो सकता है।

पैकेजिंग: अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पैकेजिंग को जलवायु, परिवहन की दूरी, और स्थानीय पसंद के अनुसार बनाना पड़ता है।

लेबलिंग: कई देशों में यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि उत्पाद का लेबल स्थानीय भाषा में हो। यूरोपीय संघ (EU) में उत्पादों पर कई भाषाओं में लेबल लगाना पड़ता है।

गुणवत्ता मानक: ISO 9001, ISO 14001 जैसे अन्तर्राष्ट्रीय गुणवत्ता प्रमाण पत्र अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में विश्वसनीयता बढ़ाते हैं।

उदाहरण: Halal और Kosher प्रमाणन — मुस्लिम देशों में Halal प्रमाणन और यहूदी बहुल देशों में Kosher प्रमाणन उत्पाद की बिक्री के लिए आवश्यक होते हैं।
विक्रय उपरांत सेवा (After Sales Service)

अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में उत्पाद बेचने के बाद ग्राहक सेवा प्रदान करना एक बड़ी चुनौती है। इसमें वारंटी, रख-रखाव, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता, और तकनीकी सहायता शामिल होती है।

विदेश में अच्छी बिक्री उपरांत सेवा के लिए कंपनियाँ स्थानीय सेवा केंद्र स्थापित करती हैं, या स्थानीय कंपनियों के साथ करार करती हैं। Samsung, LG, और Toyota इसके अच्छे उदाहरण हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय मूल्य निर्धारण को प्रभावित करने वाले तत्व

(1) परिवहन लागत: विदेश तक उत्पाद पहुंचाने में शिपिंग, बीमा, और हैंडलिंग लागत जुड़ती है।

(2) सीमा शुल्क और कर: आयातक देश के कस्टम ड्यूटी और अन्य कर मूल्य को प्रभावित करते हैं।

(3) विनिमय दर (Exchange Rate): रुपया-डॉलर के बीच विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से निर्यात की कीमत प्रभावित होती है।

(4) प्रतिस्पर्धा: विदेशी बाजार में स्थानीय प्रतिस्पर्धियों की कीमतों के अनुसार मूल्य तय करना पड़ता है।

(5) ग्राहकों की क्रय शक्ति: विभिन्न देशों में लोगों की आय और खर्च करने की क्षमता अलग होती है।

मूल्य निर्धारण विधियाँ

Cost-Plus Pricing: उत्पादन लागत में एक निश्चित लाभ प्रतिशत जोड़कर मूल्य तय किया जाता है।

Competitive Pricing: प्रतिस्पर्धियों के मूल्य के आधार पर कीमत निर्धारित की जाती है।

Value-Based Pricing: उत्पाद से ग्राहक को मिलने वाले मूल्य के आधार पर कीमत तय होती है। Apple इसी रणनीति का उपयोग करता है।

Skimming Pricing: नए उत्पादों के लिए पहले ऊंची कीमत रखी जाती है, फिर धीरे-धीरे घटाई जाती है।

Penetration Pricing: बाजार में घुसने के लिए शुरुआत में बहुत कम कीमत रखी जाती है।

अन्तर्राष्ट्रीय मूल्य निविदा और भुगतान की शर्तें

Letter of Credit (LC): यह सबसे सुरक्षित विधि है। आयातक का बैंक एक पत्र जारी करता है जिससे निर्यातक को भुगतान की गारंटी मिलती है।

Documents Against Payment (DP): जब तक आयातक भुगतान नहीं करता, तब तक उसे माल के दस्तावेज नहीं मिलते।

Advance Payment: माल भेजने से पहले ही भुगतान प्राप्त हो जाता है — निर्यातक के लिए सबसे सुरक्षित।

Open Account: माल भेजने के बाद भुगतान मांगा जाता है — आयातक के लिए सुविधाजनक परंतु निर्यातक के लिए जोखिम भरा।

Incoterms: ICC द्वारा निर्धारित अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के नियम। FOB (Free on Board), CIF (Cost, Insurance, Freight), EXW (Ex Works) — ये प्रमुख Incoterms हैं जो निर्यातक और आयातक की जिम्मेदारियाँ तय करते हैं।
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📘 Promotion • Distribution • EXIM Policy • Export Process

इकाई 3 — 15 कालखंड

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विदेशों में प्रचार, वितरण और लॉजिस्टिक्स प्रबंधन
⏱ 15 कालखंड  |  International Advertising  |  Distribution  |  Agent Selection
अन्तर्राष्ट्रीय प्रचार की विधियाँ

अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में उत्पाद का प्रचार करना घरेलू प्रचार से बिलकुल अलग होता है। यहाँ सांस्कृतिक संवेदनशीलता, भाषा की बाधाएं, और मीडिया की उपलब्धता महत्वपूर्ण कारक हैं।

Standardized Promotion: एक ही प्रचार अभियान पूरी दुनिया में चलाया जाता है। इससे लागत कम होती है और ब्रांड एकरूपता बनती है। Nike का "Just Do It" इसका उदाहरण है।

Localized Promotion: प्रत्येक देश के लिए अलग प्रचार अभियान बनाया जाता है — स्थानीय भाषा, स्थानीय सेलिब्रिटी और स्थानीय संदर्भ का उपयोग होता है।

Digital Marketing: Social Media (Facebook, Instagram, YouTube) और Email Marketing आज के युग में सबसे प्रभावी और सस्ते माध्यम हैं।

सांस्कृतिक संवेदनशीलता का उदाहरण: Pepsi का एक विज्ञापन चीन में "Pepsi Brings You Back to Life" था, जिसका गलत अनुवाद "Pepsi brings your ancestors back from the grave" हो गया — यह अन्तर्राष्ट्रीय प्रचार में सावधानी की जरूरत दर्शाता है।
प्रत्यक्ष मेल, विक्रय साहित्य और विज्ञापन

Direct Mail: विदेशी ग्राहकों को सीधे डाक या ईमेल द्वारा उत्पाद की जानकारी भेजना। B2B व्यापार में यह बहुत प्रभावी है।

Sales Literature (विक्रय साहित्य): कैटलॉग, ब्रोशर, तकनीकी पुस्तिकाएं — इन्हें स्थानीय भाषा में तैयार करना चाहिए।

अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापन: विज्ञापन माध्यम का चुनाव देश की मीडिया उपलब्धता पर निर्भर करता है। विकसित देशों में TV और Digital मीडिया प्रभावी है, विकासशील देशों में रेडियो और प्रिंट मीडिया भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

व्यापार मेले और प्रदर्शनियाँ: हनोवर मेला (जर्मनी), कैंटन मेला (चीन), India International Trade Fair (दिल्ली) — ये अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख मंच हैं।

व्यक्तिगत विक्रय (Personal Selling)

B2B अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में व्यक्तिगत विक्रय का बहुत महत्व है। विदेश में बिक्री प्रतिनिधि रखना महंगा होता है, इसलिए कंपनियाँ अक्सर स्थानीय एजेंटों (Local Agents) का सहारा लेती हैं।

एक अच्छा बिक्री प्रतिनिधि स्थानीय भाषा जानता हो, स्थानीय व्यापारिक संस्कृति को समझता हो, और उत्पाद की तकनीकी जानकारी रखता हो।

अन्तर्राष्ट्रीय वितरण माध्यम और लॉजिस्टिक्स

उत्पाद को उत्पादक से अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचाने की प्रक्रिया वितरण (Distribution) कहलाती है। अन्तर्राष्ट्रीय वितरण में यह प्रक्रिया बहुत जटिल होती है।

प्रत्यक्ष निर्यात चैनल: निर्यातक → विदेशी आयातक → थोक व्यापारी → खुदरा व्यापारी → उपभोक्ता।

अप्रत्यक्ष निर्यात चैनल: निर्यातक → निर्यात प्रबंधन कंपनी (EMC) → विदेशी बाजार।

लॉजिस्टिक्स: माल की पैकिंग, भंडारण, परिवहन, और डिलीवरी की संपूर्ण प्रक्रिया को लॉजिस्टिक्स कहते हैं। समुद्री मार्ग, वायु मार्ग, और स्थलीय मार्ग — तीनों के अपने फायदे और नुकसान हैं।

आधुनिक उदाहरण: Amazon Global Store के माध्यम से भारतीय उत्पाद सीधे अमेरिकी ग्राहकों तक पहुंचते हैं — यह अन्तर्राष्ट्रीय E-commerce Distribution का बेहतरीन उदाहरण है।
विदेशी एजेंट्स का चयन और नियुक्ति

विदेशी एजेंट वे व्यक्ति या कंपनियाँ होती हैं जो कमीशन के आधार पर निर्यातक के लिए विदेशी बाजार में काम करते हैं।

एजेंट के प्रकार: (1) बिक्री एजेंट — जो केवल ऑर्डर लेते हैं, (2) डिस्ट्रीब्यूटर — जो माल खरीदकर आगे बेचते हैं, (3) Commission Agent — जो निश्चित कमीशन पर काम करते हैं।

अच्छे एजेंट के गुण: स्थानीय बाजार की गहरी जानकारी, व्यापक व्यावसायिक संपर्क, वित्तीय स्थिरता, और उत्पाद के प्रति उत्साह।

चयन प्रक्रिया: व्यापार मेलों में संभावित एजेंटों से मिलना → पृष्ठभूमि जांच (Background Check) → कानूनी अनुबंध (Agency Agreement) तैयार करना।

इकाई 4 — 15 कालखंड

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भारत की निर्यात नीति, EXIM Policy एवं निर्यात प्रक्रिया
⏱ 15 कालखंड  |  Foreign Trade Policy  |  Export Documentation  |  Export Incentives
विदेशी व्यापार नीति (EXIM Policy) — सिंहावलोकन

EXIM Policy (Export-Import Policy) भारत सरकार द्वारा विदेशी व्यापार को नियंत्रित और प्रोत्साहित करने के लिए बनाई गई नीति है। यह नीति DGFT (Directorate General of Foreign Trade) द्वारा लागू की जाती है।

मुख्य उद्देश्य: (1) निर्यात को बढ़ावा देना, (2) आयात को नियंत्रित करना, (3) विदेशी मुद्रा अर्जित करना, (4) रोजगार के अवसर पैदा करना।

Foreign Trade Policy 2023: भारत की नवीनतम विदेश व्यापार नीति 2023 में जारी हुई। इसका लक्ष्य 2030 तक भारत के निर्यात को $2 ट्रिलियन तक पहुंचाना है।

महत्वपूर्ण तथ्य: भारत विश्व के शीर्ष निर्यातक देशों में शामिल है। भारत के प्रमुख निर्यात उत्पाद: पेट्रोलियम उत्पाद, रत्न व आभूषण, दवाइयाँ, कपड़े और सॉफ्टवेयर सेवाएं।
भारत के विदेशी व्यापार की प्रवृत्ति

1991 के उदारीकरण के बाद भारत का निर्यात तेजी से बढ़ा है। पिछले तीन दशकों में भारत के विदेशी व्यापार में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है।

निर्यात के प्रमुख गंतव्य: अमेरिका, UAE, चीन, बांग्लादेश, नीदरलैंड, UK।

आयात के प्रमुख स्रोत: चीन, UAE, अमेरिका, सऊदी अरब। भारत सबसे अधिक कच्चा तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक सामान, और मशीनरी आयात करता है।

व्यापार असंतुलन: भारत का आयात हमेशा निर्यात से अधिक रहता है, जिससे व्यापार घाटा (Trade Deficit) बना रहता है। इसे कम करना भारत की प्रमुख चुनौती है।

सेवा निर्यात: IT/BPO, पर्यटन, और शिक्षा जैसी सेवाओं में भारत विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

निर्यात उत्पाद और बाजार का चयन

निर्यात के लिए उन उत्पादों का चयन करना चाहिए जिनमें भारत की तुलनात्मक श्रेष्ठता (Comparative Advantage) है — जैसे मसाले, कपड़ा, चमड़ा उत्पाद, IT सेवाएं।

निर्यात के लिए बाजार चुनते समय विचार करें: क्या उस देश में हमारे उत्पाद की मांग है? वहाँ क्या कस्टम ड्यूटी लगती है? क्या कोई FTA है? वहाँ की भुगतान प्रणाली कैसी है?

FTA का लाभ: भारत-UAE CEPA (Comprehensive Economic Partnership Agreement) के तहत भारतीय उत्पादों पर UAE में शून्य सीमा शुल्क लगता है — यह भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ा अवसर है।
निर्यात के प्रारंभिक कदम और दस्तावेजीकरण

चरण 1 — IEC (Import Export Code): DGFT से 10 अंकों का IEC नंबर लेना पहला कदम है — निर्यात-आयात के लिए यह अनिवार्य है।

चरण 2 — उत्पाद पहचान: कौन सा उत्पाद निर्यात करना है और उसका HS Code (Harmonized System Code) क्या है।

चरण 3 — बाजार अनुसंधान: लक्षित देश की मांग, प्रतिस्पर्धा, और नियमों की जानकारी।

चरण 4 — खरीदार खोजना: Trade India, Alibaba, IndiaMART, और व्यापार मेले — खरीदार खोजने के प्रमुख प्लेटफॉर्म।

प्रमुख निर्यात दस्तावेज:

Commercial Invoice — निर्यातक द्वारा आयातक को जारी बिल।

Packing List — माल की पैकिंग का विस्तृत विवरण।

Bill of Lading / Airway Bill — परिवहन कंपनी द्वारा जारी माल रसीद।

Certificate of Origin — माल किस देश में बना है, यह प्रमाणित करता है।

Shipping Bill — Indian Customs को जमा किया जाने वाला प्रमुख दस्तावेज।

निर्यात सहायता और प्रोत्साहन

RoDTEP Scheme: निर्यातकों को Duty Refund (शुल्क वापसी) प्रदान करती है, जिससे निर्यात सस्ता और प्रतिस्पर्धी बनता है।

Export Credit: EXIM Bank और Commercial Banks से कम ब्याज पर निर्यात ऋण।

ECGC (Export Credit Guarantee Corporation): निर्यात जोखिम का बीमा करती है।

SEZ (Special Economic Zones): इन क्षेत्रों में निर्यात करने वाली कंपनियों को Tax Holiday और अन्य सुविधाएं मिलती हैं।

Market Development Assistance (MDA): छोटे निर्यातकों को विदेश में व्यापार मेलों में भाग लेने के लिए सब्सिडी दी जाती है।

Trade Promotion Organizations: FIEO, CII, FICCI — ये संस्थाएं निर्यातकों की मदद करती हैं।

निर्यात मूल्य नीति: Dumping — जब कोई देश किसी उत्पाद को विदेश में घरेलू कीमत से कम पर बेचता है। WTO के नियमों के अनुसार यह अनुचित व्यापार प्रथा है। Anti-Dumping Duty लगाकर देश इससे अपनी रक्षा करते हैं।

पाठ्यक्रम सारांश

इकाईमुख्य विषयकालखंड
1अन्तर्राष्ट्रीय विपणन परिचय, वातावरण, बाजार चयन एवं प्रवेश माध्यम15
2उत्पाद नियोजन, ब्रांडिंग, मूल्य निर्धारण, भुगतान विधियाँ15
3प्रचार विधियाँ, विज्ञापन, वितरण, लॉजिस्टिक्स, एजेंट चयन15
4भारत की निर्यात नीति, EXIM Policy, निर्यात प्रक्रिया, प्रोत्साहन15
कुल कालखंड60

प्रमुख शब्द (Key Terms)

अन्तर्राष्ट्रीय विपणन PESTEL विदेशी बाज़ार Standardization Adaptation Glocalization Incoterms Letter of Credit Dumping FDI Joint Venture DGFT IEC Code SEZ Supply Chain EXIM Policy RoDTEP ECGC Bill of Lading FTA / CEPA
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