चालुक्य एवं राष्ट्रकूट वंश
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| चालुक्य एवं राष्ट्रकूट वंश |
B.A. Semester-II · प्राचीन भारतीय इतिहास · ,
दक्षिण भारत के इतिहास में चालुक्य और राष्ट्रकूट वंश दो ऐसी शक्तियाँ थीं जिन्होंने दक्कन (Deccan) क्षेत्र पर लम्बे समय तक शासन किया और भारतीय इतिहास की दिशा को प्रभावित किया। बादामी के चालुक्यों ने छठी से आठवीं शताब्दी ई. तक और राष्ट्रकूटों ने आठवीं से दसवीं शताब्दी ई. तक दक्कन पर अपना वर्चस्व स्थापित किया। इन दोनों राजवंशों ने न केवल सैन्य शक्ति बल्कि स्थापत्य कला और सांस्कृतिक उपलब्धियों में भी भारत को अपूर्व योगदान दिया।
चालुक्य वंश की तीन प्रमुख शाखाएँ थीं — बादामी (वातापी) के चालुक्य, वेंगी के पूर्वी चालुक्य और कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बादामी के चालुक्य थे जिन्होंने दक्कन की सबसे शक्तिशाली राजसत्ता स्थापित की। उनकी राजधानी बादामी (वातापी) आधुनिक कर्नाटक में स्थित थी।
चालुक्य वंश के संस्थापक पुलकेशिन प्रथम थे जिन्होंने लगभग 543 ई. में बादामी में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की। उनके पूर्वज सातवाहनों और कदम्बों के सामंत थे। पुलकेशिन प्रथम ने "अश्वमेध" और "वाजपेय" यज्ञ किए और अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।
पुलकेशिन द्वितीय (609–642 ई.) बादामी के चालुक्यों का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसने उत्तर में हर्षवर्धन को पराजित किया, दक्षिण में पल्लवों से संघर्ष किया और पश्चिमी तट के बन्दरगाहों पर नियंत्रण स्थापित किया।
पुलकेशिन द्वितीय की सबसे बड़ी उपलब्धि हर्षवर्धन के विरुद्ध विजय थी। हर्षवर्धन उत्तर भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट था और वह दक्षिण भारत को भी जीतना चाहता था। परन्तु नर्मदा नदी के तट पर पुलकेशिन ने हर्ष को पराजित किया। इससे दक्कन की स्वतन्त्रता सुरक्षित रही। बाणभट्ट के "हर्षचरित" में इस पराजय का संकेत मिलता है।
ह्वेनसांग (युआनच्वांग) पुलकेशिन द्वितीय के दरबार में आया था। उसने पुलकेशिन को एक महान और न्यायप्रिय शासक बताया। उसके विवरण से उस काल की राजनीतिक स्थिति और सामाजिक जीवन की जानकारी मिलती है। इस यात्रा से स्पष्ट होता है कि पुलकेशिन का दरबार अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व का केन्द्र था।
पुलकेशिन द्वितीय का सबसे लम्बा संघर्ष पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम के साथ था। 642 ई. में नरसिंहवर्मन ने बादामी पर आक्रमण किया और पुलकेशिन को पराजित करके उसकी राजधानी को नष्ट किया। पुलकेशिन इस युद्ध में मारा गया। यह बादामी के चालुक्यों के लिए एक बड़ा आघात था।
बादामी के चालुक्यों ने दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला में एक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनके काल में "वेसर शैली" का विकास हुआ जो उत्तर भारत की "नागर शैली" और दक्षिण की "द्रविड़ शैली" का मिश्रण थी।
🏛️ बादामी गुफा मन्दिर
- चार गुफा मन्दिर — तीन हिन्दू, एक जैन
- विष्णु और शिव की अद्भुत मूर्तियाँ
- छठी शताब्दी ई. में निर्मित
- वराह अवतार की विशाल मूर्ति
🏛️ ऐहोल और पट्टदकल
- 70 से अधिक मन्दिर (ऐहोल)
- दुर्गा मन्दिर — अर्धवृत्ताकार
- पट्टदकल — UNESCO विश्व धरोहर
- विरूपाक्ष मन्दिर — सर्वश्रेष्ठ
राष्ट्रकूट वंश का उदय चालुक्यों के पतन के बाद हुआ। दन्तिदुर्ग ने 753 ई. में चालुक्य राजा कीर्तिवर्मन द्वितीय को पराजित करके राष्ट्रकूट साम्राज्य की स्थापना की। उनकी राजधानी प्रारम्भ में "माण्यखेट" (आधुनिक मालखेड, कर्नाटक) थी।
राष्ट्रकूट वंश भारतीय इतिहास की सबसे शक्तिशाली राजसत्ताओं में से एक था। इनके साम्राज्य की सीमाएँ उत्तर में गंगा के मैदान से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अरब सागर तक विस्तृत थीं।
| शासक | काल | प्रमुख उपलब्धि |
|---|---|---|
| दन्तिदुर्ग | 735–756 ई. | राष्ट्रकूट वंश की स्थापना; चालुक्यों को पराजित किया |
| कृष्ण प्रथम | 756–774 ई. | एलोरा का कैलास मन्दिर — विश्व की महानतम मूर्ति-कला |
| ध्रुव | 780–793 ई. | उत्तर भारत में "त्रिपक्षीय संघर्ष" में भाग |
| गोविन्द तृतीय | 793–814 ई. | सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्रकूट; गंगा तक विजय |
| अमोघवर्ष प्रथम | 814–878 ई. | शान्तिप्रिय विद्वान; "कविराजमार्ग" की रचना |
| कृष्ण तृतीय | 939–967 ई. | रामेश्वरम तक विजय; अन्तिम महान राष्ट्रकूट |
राष्ट्रकूट वंश की सबसे अमर धरोहर एलोरा का कैलास मन्दिर है। राजा कृष्ण प्रथम ने इस मन्दिर का निर्माण करवाया। यह मन्दिर एक विशाल पहाड़ को ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनाया गया है। यह विश्व की सबसे बड़ी एकाश्म (monolithic) संरचना है।
कैलास मन्दिर में भगवान शिव के कैलास पर्वत की परिकल्पना को साकार किया गया है। इसकी ऊँचाई 32 मीटर, लम्बाई 84 मीटर और चौड़ाई 47 मीटर है। इस मन्दिर के निर्माण में अनुमानतः 7000 टन पत्थर काटा गया। इस मन्दिर में शिव की लीलाओं, महाभारत और रामायण के दृश्यों की अत्यंत सुन्दर मूर्तियाँ हैं।
राष्ट्रकूट शासक विद्या और साहित्य के महान संरक्षक थे। अमोघवर्ष प्रथम स्वयं एक उत्कृष्ट विद्वान थे। उन्होंने कन्नड़ भाषा में "कविराजमार्ग" नामक ग्रंथ लिखा जो कन्नड़ साहित्य का प्रथम महत्त्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। वे जैन धर्म के प्रति विशेष आस्थावान थे।
अरब व्यापारी सुलेमान ने अमोघवर्ष को विश्व के चार महान राजाओं में से एक बताया — बगदाद का खलीफा, चीन का सम्राट, कांस्टेण्टिनोपल का बादशाह और अमोघवर्ष। यह उनकी अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रमाण है।
आठवीं-नौवीं शताब्दी में उत्तर भारत के "कन्नौज" पर अधिकार के लिए तीन शक्तियों में संघर्ष हुआ — प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट। इस "त्रिपक्षीय संघर्ष" में राष्ट्रकूट शासक ध्रुव, गोविन्द तृतीय और इन्द्र तृतीय ने कन्नौज पर अधिकार किया। यद्यपि वे कन्नौज पर स्थायी शासन नहीं स्थापित कर सके, तथापि उत्तर भारत में राष्ट्रकूट की धाक अवश्य जमी।
दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राष्ट्रकूट शक्ति क्षीण होने लगी। 973 ई. में तैलप द्वितीय के नेतृत्व में पश्चिमी चालुक्यों ने राष्ट्रकूट राजा कर्क द्वितीय को पराजित करके राष्ट्रकूट साम्राज्य का अन्त किया। इस प्रकार दक्कन में कल्याणी के चालुक्यों का नया युग प्रारम्भ हुआ।
चालुक्य और राष्ट्रकूट — दोनों राजवंशों ने दक्कन के इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी। पुलकेशिन द्वितीय की हर्षवर्धन पर विजय, कृष्ण प्रथम का कैलास मन्दिर, अमोघवर्ष का विद्या-प्रेम — ये सब भारतीय इतिहास और संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। बादामी, ऐहोल, पट्टदकल और एलोरा के मन्दिर आज भी उन महान शासकों की कीर्ति के साक्षी हैं। इन राजवंशों ने "वेसर स्थापत्य शैली" के माध्यम से उत्तर और दक्षिण भारत की कला-परम्पराओं का अद्भुत समन्वय किया।

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