गुर्जर-प्रतिहार, पाल एवं सेन वंश
B.A. Semester-II · प्राचीन भारतीय इतिहास · Gurjar, Pratihar, Pal and Sen Dynasty
आठवीं से बारहवीं शताब्दी ई. के बीच उत्तर भारत के राजनीतिक इतिहास पर तीन राजवंशों का वर्चस्व रहा — गुर्जर-प्रतिहार (पश्चिम), पाल (पूर्व) और राष्ट्रकूट (दक्षिण)। इन तीनों के बीच कन्नौज पर अधिकार के लिए "त्रिपक्षीय संघर्ष" हुआ जो भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। बाद में पाल वंश के स्थान पर सेन वंश का उदय हुआ जिसने बंगाल पर शासन किया।
राजधानी: कन्नौज
काल: 8वीं–10वीं सदी
राजधानी: मुंगेर
काल: 8वीं–12वीं सदी
राजधानी: नदिया
काल: 11वीं–12वीं सदी
गुर्जर-प्रतिहार वंश की स्थापना नागभट्ट प्रथम ने की थी। "प्रतिहार" शब्द का अर्थ है — द्वारपाल। एक परम्परा के अनुसार इस वंश के पूर्वज भगवान राम के भाई लक्ष्मण के वंशज थे जो उनके द्वारपाल थे। इस वंश ने राजस्थान और गुजरात क्षेत्र से अपनी शक्ति का विस्तार किया।
नागभट्ट प्रथम का सबसे बड़ा योगदान अरब आक्रमणों को रोकना था। 8वीं शताब्दी में अरब सेनापति जुनैद और तमीम ने गुजरात और राजस्थान पर आक्रमण किए। नागभट्ट ने इन आक्रमणों को रोका और उन्हें पराजित किया। इस कारण उन्हें "अरब आक्रमण का रोधक" कहा जाता है।
मिहिरभोज (836–885 ई.) गुर्जर-प्रतिहार वंश का सबसे महान शासक था। उसके शासनकाल में साम्राज्य की सीमाएँ उत्तर में हिमालय से दक्षिण में नर्मदा तक और पूर्व में बंगाल से पश्चिम में सिन्ध तक विस्तृत थीं। उसकी राजधानी कन्नौज थी। मिहिरभोज विष्णु का भक्त था और "आदिवराह" की उपाधि धारण करता था। अरब यात्री सुलेमान ने उसे विश्व के चार महान राजाओं में से एक माना।
| प्रतिहार शासक | काल | उपलब्धि |
|---|---|---|
| नागभट्ट प्रथम | 730–756 ई. | अरब आक्रमण को रोका |
| वत्सराज | 778–805 ई. | त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग |
| नागभट्ट द्वितीय | 805–833 ई. | कन्नौज पर अधिकार |
| मिहिरभोज | 836–885 ई. | साम्राज्य का चरमोत्कर्ष |
| महेन्द्रपाल | 885–910 ई. | साम्राज्य का विस्तार |
पाल वंश की स्थापना गोपाल ने 750 ई. में की थी। बंगाल में लम्बे समय तक अराजकता (मत्स्यन्याय — बड़ी मछली छोटी को खाती है) के बाद जनता ने गोपाल को राजा चुना। इस प्रकार पाल वंश भारत के प्रथम लोकतान्त्रिक ढंग से चुने गए शासक थे। पाल शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।
धर्मपाल (770–810 ई.) पाल वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसने त्रिपक्षीय संघर्ष में सक्रिय भाग लिया और कन्नौज पर अधिकार किया। धर्मपाल बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था। उसने विक्रमशिला और ओदन्तपुरी विश्वविद्यालयों की स्थापना की। उसने 50 बौद्ध मठों का निर्माण करवाया।
पाल शासकों ने बौद्ध शिक्षा के दो महान केन्द्रों को संरक्षण दिया — नालन्दा और विक्रमशिला। नालन्दा तो गुप्त काल से प्रसिद्ध था, परन्तु विक्रमशिला की स्थापना धर्मपाल ने की। ये दोनों विश्वविद्यालय न केवल भारत में बल्कि सम्पूर्ण एशिया में बौद्ध शिक्षा के केन्द्र थे।
पाल काल में बंगाल में एक विशिष्ट कला-शैली का विकास हुआ जिसे "पाल शैली" कहते हैं। इस शैली में बौद्ध देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं। ये मूर्तियाँ काले पत्थर से बनती थीं और इनमें सूक्ष्म कलाकारी थी। पाल कला का प्रभाव तिब्बत, बर्मा और नेपाल तक फैला।
सेन वंश की स्थापना सामन्त सेन ने की थी। वे दक्षिण भारत (कर्नाटक) से बंगाल आए थे। 11वीं शताब्दी में उन्होंने पाल वंश की कमजोरी का लाभ उठाकर बंगाल में अपनी शक्ति स्थापित की।
विजयसेन सेन वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। उसने बंगाल के अधिकांश भाग पर अधिकार किया और पाल शासन को समाप्त किया। बल्लालसेन विद्वान शासक था जिसने "दानसागर" और "अद्भुतसागर" ग्रंथों की रचना की। उन्होंने बंगाल में "कुलीन प्रथा" चलाई जो बाद में एक सामाजिक समस्या बन गई।
लक्ष्मणसेन सेन वंश का अन्तिम महान शासक था। उसके दरबार में महाकवि जयदेव "गीतगोविन्द" की रचना हुई। 1203 ई. में मुहम्मद बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर आक्रमण किया और नालन्दा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालयों को नष्ट किया। लक्ष्मणसेन को राजधानी छोड़कर भागना पड़ा और इसी के साथ सेन वंश का अन्त हुआ।
गुर्जर-प्रतिहार, पाल और सेन — इन तीनों वंशों ने भारतीय इतिहास को महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रतिहारों ने अरब आक्रमणों से भारत की रक्षा की, पालों ने बौद्ध शिक्षा और कला को समृद्ध किया, और सेनों ने बंगाल में ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान किया। इन राजवंशों के बीच का त्रिपक्षीय संघर्ष उत्तर भारत को कमजोर करता रहा जिसका परिणाम बाद में मुस्लिम आक्रमणों के समय देखने को मिला।

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