राजपूतकालीन संस्कृति
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| राजपूतकालीन संस्कृति |
राजपूत काल (लगभग 700–1200 ई.) भारतीय संस्कृति के इतिहास में एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण अध्याय है। इस काल में धर्म, साहित्य, कला, स्थापत्य और समाज के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण विकास हुए। राजपूत दरबार वीर-रस के काव्य और शौर्य-गाथाओं के केन्द्र थे। खजुराहो के मन्दिर, आबू के देलवाड़ा जैन मन्दिर और उड़ीसा के सूर्य मन्दिर — राजपूत कालीन स्थापत्य की अमर धरोहर हैं।
राजपूत काल में हिन्दू धर्म का व्यापक पुनरुत्थान हुआ। शैव, वैष्णव और शाक्त — तीनों सम्प्रदाय इस काल में अत्यंत लोकप्रिय थे। राजपूत राजा प्रायः शैव धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने अनेक शिव मन्दिरों का निर्माण करवाया। भक्ति आन्दोलन का विस्तार भी इसी काल में हुआ।
राजपूत काल में जैन धर्म को भी महत्त्वपूर्ण संरक्षण मिला। गुजरात के सोलंकी शासकों के काल में जैन व्यापारियों ने अत्यंत भव्य जैन मन्दिरों का निर्माण करवाया। माउंट आबू के देलवाड़ा जैन मन्दिर (1031 ई.) इस काल की सर्वोत्कृष्ट कृति है। इसका निर्माण सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम के मंत्री विमलशाह ने करवाया था।
राजपूत काल में हिन्दी और अपभ्रंश साहित्य का महत्त्वपूर्ण विकास हुआ। राजपूत दरबारों में "चारण" कवि होते थे जो राजाओं की वीरता का गुणगान करते थे। इस काल का सर्वाधिक प्रसिद्ध काव्य "पृथ्वीराज रासो" है जिसकी रचना चन्दबरदाई ने की। यह हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। इस काव्य में पृथ्वीराज चौहान की वीरता और प्रेम-कथाओं का वर्णन है।
राजपूत दरबारों में संस्कृत साहित्य भी फला-फूला। राजा भोज परमार स्वयं एक महान संस्कृत विद्वान थे। उन्होंने "सरस्वतीकण्ठाभरण", "राजमार्तण्ड" और "समरांगण सूत्रधार" जैसे ग्रंथ लिखे। बिल्हण ने "विक्रमांकदेवचरित" और जयदेव ने "गीतगोविन्द" की रचना इसी काल में की। "गीतगोविन्द" भारतीय भक्ति साहित्य की अमर रचना है।
खजुराहो (मध्यप्रदेश) के मन्दिर चन्देल राजपूत शासकों ने बनवाए थे। ये मन्दिर 950 से 1050 ई. के बीच निर्मित हुए। इनकी विशेषता इनकी बाहरी दीवारों पर उत्कीर्ण मूर्तियाँ हैं जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं। खजुराहो में मूलतः 85 मन्दिर थे जिनमें से आज केवल 25 शेष हैं। इन्हें 1986 में UNESCO विश्व धरोहर में शामिल किया गया।
उड़ीसा में गंग वंश के शासनकाल में भव्य मन्दिरों का निर्माण हुआ। भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर, पुरी का जगन्नाथ मन्दिर और कोणार्क का सूर्य मन्दिर — ये तीनों उड़ीसा स्थापत्य के सर्वोच्च उदाहरण हैं। कोणार्क का सूर्य मन्दिर (1250 ई.) रथ के आकार में बना है और इसे "ब्लैक पैगोडा" भी कहा जाता है।
🏛️ प्रमुख मन्दिर
- खजुराहो (चन्देल)
- देलवाड़ा जैन मन्दिर
- लिंगराज मन्दिर, भुवनेश्वर
- कोणार्क सूर्य मन्दिर
- सोमनाथ मन्दिर (गुजरात)
📖 प्रमुख साहित्य
- पृथ्वीराज रासो (चन्दबरदाई)
- गीतगोविन्द (जयदेव)
- विक्रमांकदेवचरित (बिल्हण)
- राजतरंगिणी (कल्हण)
- सरस्वतीकण्ठाभरण (राजा भोज)
राजपूत समाज में वीरता, स्वाभिमान और सम्मान को सर्वोच्च मूल्य माना जाता था। "जौहर" (पति के वीरगति पाने पर पत्नी का अग्नि में प्रवेश) और "साका" (युद्ध में मरण) राजपूत जीवन-मूल्यों के प्रतीक थे। सामन्त-प्रथा समाज का आधार थी। राजा के अधीन सामन्त होते थे जो उसे सैनिक सहायता देते थे।
स्त्रियों की स्थिति के विषय में राजपूत काल में दोहरापन था। एक ओर रानियाँ और राजकुमारियाँ अत्यंत सम्मानित थीं तो दूसरी ओर बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा और सती-प्रथा जैसी कुरीतियाँ भी थीं।
राजपूत काल भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत समृद्ध युग था। खजुराहो की मूर्तिकला, देलवाड़ा के संगमरमर, कोणार्क की विशालता, पृथ्वीराज रासो की वीरता और गीतगोविन्द की भक्ति — ये सब मिलकर एक ऐसी सांस्कृतिक विरासत बनाते हैं जो सदियों बाद भी भारतीय जन-मानस को गौरवान्वित करती है।

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