हर्षवर्धन : विजयें एवं प्रशासन
| हर्षवर्धन : विजयें एवं प्रशासन |
B.A. Semester-II · प्राचीन भारतीय इतिहास · Harshvardhan — Conquests and Administration
हर्षवर्धन उत्तर भारत का अन्तिम महान हिन्दू सम्राट था जिसने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद बिखरे हुए उत्तर भारत को एकता के सूत्र में पिरोया। उसका शासनकाल (606–647 ई.) भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। साहित्य, कला और धर्म का संरक्षक, प्रजापालक शासक और अथक विजेता — हर्षवर्धन इन सभी भूमिकाओं में सफल रहा। उसके दरबार में बाणभट्ट और चीनी यात्री ह्वेनसांग जैसी विभूतियाँ थीं जिनके विवरणों से हमें उस काल की विस्तृत जानकारी मिलती है।
हर्षवर्धन पुष्यभूति (वर्धन) वंश का सबसे प्रतापी शासक था। उसके पिता प्रभाकरवर्धन थानेसर (हरियाणा) के शासक थे। प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र राज्यवर्धन सिंहासन पर बैठे। परन्तु मालव राजा देवगुप्त और गौड़ राजा शशांक ने षड्यन्त्र करके राज्यवर्धन को मरवा दिया। इस घटना से हर्षवर्धन अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने शशांक से बदला लेने की प्रतिज्ञा की।
606 ई. में मात्र 16 वर्ष की आयु में हर्षवर्धन सिंहासन पर बैठा। उसने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया और अपने राज्य का विस्तार करना प्रारम्भ किया। उसकी बहन राज्यश्री को कन्नौज के मौखरि राजा ग्रहवर्मन से विवाह किया गया था। ग्रहवर्मन भी शशांक के षड्यन्त्र में मारे गए थे इसलिए हर्ष ने कन्नौज को भी अपने राज्य में मिला लिया।
हर्षवर्धन ने अगले छह वर्षों में अथक अभियानों के द्वारा उत्तर भारत के अधिकांश भाग को अपने अधीन किया। उसने पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के अनेक राज्यों को जीता। बाणभट्ट के "हर्षचरित" में उसकी विजयों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
गौड़ (बंगाल) के राजा शशांक हर्ष के सबसे बड़े शत्रु थे। शशांक एक शैव राजा था जिसने बौद्ध धर्म के विरुद्ध अनेक कार्य किए। हर्ष ने कामरूप (असम) के राजा भास्करवर्मन के साथ मिलकर शशांक के विरुद्ध संघर्ष किया। शशांक की मृत्यु (637 ई.) के बाद हर्ष ने गौड़ राज्य पर भी अधिकार कर लिया।
हर्षवर्धन ने दक्षिण भारत को भी जीतने का प्रयास किया परन्तु नर्मदा नदी के तट पर बादामी के चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने उसे पराजित किया। यह हर्ष की एकमात्र पराजय थी। इसके बाद नर्मदा नदी हर्ष और पुलकेशिन के साम्राज्यों की सीमा बन गई।
हर्षवर्धन की प्रशासनिक व्यवस्था गुप्त काल की परम्परा पर आधारित थी परन्तु उसमें अनेक नई विशेषताएँ थीं। राजा सर्वोच्च था और स्वयं न्याय, युद्ध और प्रशासन में भाग लेता था। ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष अत्यंत परिश्रमी था — वह दिन को चार भागों में बाँटता था जिसमें से एक भाग राजकार्य को, एक भाग धर्म को और दो भाग विश्राम को देता था।
साम्राज्य को "भुक्तियों" में विभाजित किया गया था। प्रत्येक भुक्ति का प्रशासक "लोकपाल" या "उपरिक" कहलाता था। भुक्तियाँ "विषयों" में और विषय "ग्रामों" में विभाजित थे। ग्राम की सबसे छोटी इकाई थी जिसका प्रशासन ग्राम-सभा द्वारा होता था।
| प्रशासनिक इकाई | अधिकारी | कार्य |
|---|---|---|
| केन्द्र | सम्राट + मंत्रिपरिषद् | सर्वोच्च शासन |
| भुक्ति (प्रान्त) | लोकपाल / उपरिक | प्रान्तीय प्रशासन |
| विषय (जिला) | विषयपति | जिला प्रशासन |
| ग्राम | ग्रामिक | ग्राम प्रशासन |
हर्षवर्धन की सेना अत्यंत विशाल थी। ह्वेनसांग के अनुसार उसके पास 60,000 हाथी, 1,00,000 घुड़सवार और विशाल पैदल सेना थी। हाथी सेना उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी। सेना का सर्वोच्च अधिकारी "महाबलाधिकृत" था।
चीनी यात्री ह्वेनसांग 629 से 645 ई. तक भारत में रहा और उसने हर्ष के दरबार में भी समय बिताया। उसके विवरण से हमें हर्षकालीन समाज की विस्तृत जानकारी मिलती है। उसके अनुसार उस काल में जनता सामान्यतः सुखी थी, अपराध कम थे और राज्य का शासन न्यायपूर्ण था।
हर्ष के समय समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — चारों वर्ण थे। छुआछूत की प्रथा थी जिसका उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है। स्त्रियों की दशा सामान्यतः सम्मानजनक थी। बौद्ध धर्म का विशेष प्रभाव था।
हर्षवर्धन स्वयं एक उत्कृष्ट साहित्यकार था। उसने संस्कृत में तीन नाटक लिखे — "रत्नावली", "प्रियदर्शिका" और "नागानन्द"। "नागानन्द" एक बौद्ध नाटक है जो बोधिसत्त्व जीमूतवाहन की कथा पर आधारित है। हर्ष के दरबारी कवि बाणभट्ट ने "हर्षचरित" और "कादम्बरी" जैसी अमर रचनाएँ लिखीं।
धार्मिक दृष्टि से हर्ष का विकास रोचक है। प्रारम्भ में वह शैव था, फिर वैष्णव हुआ और अन्त में बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया। उसने नालन्दा विश्वविद्यालय को विशेष संरक्षण दिया। ह्वेनसांग नालन्दा में अध्ययन के लिए ही भारत आया था।
647 ई. में हर्षवर्धन की मृत्यु हो गई। उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं था इसलिए उसका विशाल साम्राज्य बिखर गया। उसके मंत्री अर्जुन ने सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश की परन्तु चीनी राजदूत वांग हुएन-त्से ने नेपाल और तिब्बत से सेना लाकर अर्जुन को पराजित किया। हर्ष की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में फिर से विखंडन और अस्थिरता आ गई।
हर्षवर्धन गुप्त साम्राज्य के बाद उत्तर भारत का सबसे महान शासक था। उसने अपनी सैनिक शक्ति, प्रशासनिक कुशलता और उदार व्यक्तित्व से एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया। साहित्यकार, धर्म-संरक्षक और दानशील राजा के रूप में वह भारतीय इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा। ह्वेनसांग और बाणभट्ट के विवरणों ने उसके काल को इतिहास में अमर कर दिया।
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