पल्लव वंश - कला और स्थापत्य का स्वर्णकाल | B.A. Semester-II

Unit II · Chapter 6

पल्लव वंश - कला और स्थापत्य का स्वर्णकाल 

पल्लव वंश - कला और स्थापत्य का स्वर्णकाल 


B.A. Semester-II · प्राचीन भारतीय इतिहास · Pallava Dynasty — कला और स्थापत्य का स्वर्णकाल

📖 Chapter 6 🏛️ द्रविड़ स्थापत्य 🎨 महाबलिपुरम ✍️ 1600+ शब्द

पल्लव वंश दक्षिण भारत के इतिहास में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। तीसरी शताब्दी ई. से नौवीं शताब्दी ई. तक राज्य करने वाले पल्लव शासकों ने न केवल राजनीतिक शक्ति प्राप्त की बल्कि उन्होंने द्रविड़ स्थापत्य शैली को जन्म दिया जो आगे चलकर सम्पूर्ण दक्षिण भारत की मन्दिर-निर्माण शैली का आधार बनी। कांचीपुरम की सांस्कृतिक राजधानी और महाबलिपुरम के रथ-मन्दिर — पल्लव शासन की अमर धरोहर हैं।

शासनकाल
275 ई. – 897 ई. (लगभग)
राजधानी
कांचीपुरम
प्रमुख उपलब्धि
द्रविड़ स्थापत्य शैली
धर्म
शैव, वैष्णव
पल्लव वंश की उत्पत्ति

पल्लव वंश की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ विद्वान उन्हें ब्राह्मण मानते हैं जबकि कुछ क्षत्रिय। एक मत के अनुसार "पल्लव" शब्द तमिल के "तोण्डैमान" का संस्कृत रूपान्तरण है। दूसरे मत के अनुसार पल्लव उत्तर भारत से आए पार्थियन (पह्लव) लोगों के वंशज थे। तीसरे मत के अनुसार वे आन्ध्र के सातवाहन साम्राज्य के सामंत थे जो बाद में स्वतन्त्र हो गए।

पल्लव वंश के प्रारम्भिक शासकों के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। लगभग तीसरी शताब्दी ई. में यह वंश ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हुआ। उनकी राजधानी कांचीपुरम (आधुनिक कांचीवरम, तमिलनाडु) थी जो उस काल में दक्षिण भारत का एक प्रमुख सांस्कृतिक और धार्मिक केन्द्र था।

प्रमुख पल्लव शासक
शासककाल (लगभग)प्रमुख उपलब्धि
सिंहविष्णु575–600 ई.पल्लव साम्राज्य की पुनर्स्थापना; कालिदास को संरक्षण
महेन्द्रवर्मन प्रथम600–630 ई.गुफा-मन्दिरों का निर्माण; मत्तविलास प्रहसन की रचना
नरसिंहवर्मन प्रथम630–668 ई.महाबलिपुरम के रथ-मन्दिर; वातापी विजय; "मामल्ल" उपाधि
परमेश्वरवर्मन प्रथम669–690 ई.चालुक्यों से संघर्ष
नरसिंहवर्मन द्वितीय700–728 ई.कांची के कैलासनाथ मन्दिर का निर्माण
नन्दिवर्मन द्वितीय731–795 ई.वैकुण्ठ पेरुमाल मन्दिर; पल्लव शक्ति का पुनरुद्धार
महेन्द्रवर्मन प्रथम — विद्वान राजा

महेन्द्रवर्मन प्रथम पल्लव वंश के सर्वाधिक बहुमुखी शासकों में से एक थे। वे न केवल एक कुशल योद्धा थे बल्कि कवि, संगीतज्ञ और वास्तुकार भी थे। उन्होंने संस्कृत में "मत्तविलास प्रहसन" नामक एक व्यंग्य नाटक लिखा जो अत्यंत प्रसिद्ध है।

महेन्द्रवर्मन ने गुफाओं को काटकर मन्दिर बनाने की परम्परा का प्रारम्भ किया। यह "गुफा-स्थापत्य" शैली की पहली महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति थी। उन्होंने "मण्डागपट्टु" में पहला पल्लव गुफा-मन्दिर बनवाया और उस पर लिखवाया — "बिना ईंट, चूने, लकड़ी और धातु के यह देवालय बनाया गया।" प्रारम्भ में महेन्द्रवर्मन जैन धर्म के अनुयायी थे परन्तु बाद में शैव सन्त अप्पर के प्रभाव से वे शैव धर्म में आ गए।

नरसिंहवर्मन प्रथम — महाबलिपुरम के निर्माता

नरसिंहवर्मन प्रथम पल्लव वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक थे। उन्हें "मामल्ल" (महान पहलवान) की उपाधि प्राप्त थी। उनकी सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के विरुद्ध विजय थी। उन्होंने 642 ई. में वातापी (आधुनिक बादामी) पर आक्रमण किया और चालुक्यों को पराजित किया। इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने "वातापीकोण्ड" (वातापी का विजेता) की उपाधि धारण की।

🏛️ महाबलिपुरम के रथ-मन्दिर

नरसिंहवर्मन के शासनकाल में महाबलिपुरम (मामल्लपुरम) में विशाल शिला-मन्दिरों का निर्माण हुआ। "पाँच रथ" (पञ्च पाण्डव रथ) एकाश्म (एक ही पत्थर से काटे गए) मन्दिर हैं जो द्रविड़ स्थापत्य के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। "अर्जुन की तपस्या" या "गंगावतरण" विश्व की सबसे बड़ी एकाश्म शिला-चित्रकारी है।

पल्लव और चालुक्य संघर्ष

पल्लव वंश का सबसे लम्बा और महत्त्वपूर्ण संघर्ष बादामी के चालुक्यों से था। यह संघर्ष लगभग दो शताब्दियों तक चला। चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने कांचीपुरम तक आक्रमण किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। नरसिंहवर्मन ने पुलकेशिन को पराजित किया और उसकी राजधानी वातापी को नष्ट किया।

इस संघर्ष में दोनों पक्षों को बारी-बारी सफलता मिलती रही। परमेश्वरवर्मन प्रथम ने "पेरुवलनल्लूर के युद्ध" में चालुक्यों को पराजित किया। यह संघर्ष अन्ततः राष्ट्रकूटों के उदय के साथ समाप्त हुआ।

पल्लव स्थापत्य कला

पल्लव स्थापत्य कला के चार प्रमुख चरण थे। पहला चरण महेन्द्रवर्मन शैली — इसमें पहाड़ों को काटकर गुफा-मन्दिर बनाए गए। दूसरा चरण मामल्ल शैली — नरसिंहवर्मन के समय एकाश्म रथ-मन्दिर बने। तीसरा चरण राजसिंह शैली — नरसिंहवर्मन द्वितीय के समय पत्थरों को जोड़कर मन्दिर बने जिसमें कैलासनाथ मन्दिर सर्वश्रेष्ठ है। चौथा चरण नन्दिवर्मन शैली — इसमें वैकुण्ठ पेरुमाल जैसे मन्दिर बने।

UNESCO विश्व धरोहर: महाबलिपुरम के पल्लव स्मारकों को UNESCO ने 1984 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। ये स्मारक भारतीय स्थापत्य कला के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में से हैं।
पल्लव काल में शिक्षा और साहित्य

कांचीपुरम पल्लव काल में दक्षिण भारत का सबसे बड़ा शिक्षा केन्द्र था। यहाँ का "घटिका" (विद्यालय) अत्यंत प्रसिद्ध था। बौद्ध विद्वान दिग्नाग और धर्मपाल यहाँ के प्रसिद्ध आचार्य थे। संस्कृत व्याकरण के महान आचार्य भारवि और दण्डी भी पल्लव दरबार से सम्बन्धित थे।

पल्लव काल में भक्ति आन्दोलन का भी उदय हुआ। नयनमार (शैव सन्त) और आलवार (वैष्णव सन्त) इसी काल में हुए। उनकी रचनाएँ तमिल भक्ति साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।

पल्लव वंश का पतन

नौवीं शताब्दी में पल्लव शक्ति क्षीण होने लगी। चोल राजा आदित्य प्रथम ने अन्तिम पल्लव राजा अपराजित को लगभग 897 ई. में पराजित करके पल्लव वंश का अन्त किया। इस प्रकार दक्षिण भारत में चोल वंश का युग प्रारम्भ हुआ।

निष्कर्ष

पल्लव वंश दक्षिण भारत के इतिहास में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। उनकी सबसे बड़ी देन द्रविड़ स्थापत्य शैली है जो आगे चलकर दक्षिण भारत के मन्दिर-निर्माण का आधार बनी। महाबलिपुरम के रथ-मन्दिर और कांचीपुरम के मन्दिर आज भी उनकी महानता के साक्षी हैं। भक्ति आन्दोलन को प्रश्रय देना, शिक्षा को प्रोत्साहन देना और संस्कृत-तमिल दोनों भाषाओं का संरक्षण करना — ये पल्लव शासन की विशेषताएँ थीं।

📚 B.A. Semester-II · Ancient Indian History ✍️ Unit II, Chapter 6 ·

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