संगम वंश : चोल, चेर एवं पाण्ड्य
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संगम वंश : चोल, चेर एवं पाण्ड्य |
B.A. Semester-II · प्राचीन भारतीय इतिहास · Sangam Dynasty — Chola, Cher and Pandya
दक्षिण भारत का प्राचीन इतिहास उतना ही गौरवशाली है जितना उत्तर भारत का। संगम काल (लगभग 300 ई.पू. से 300 ई.) दक्षिण भारत का वह स्वर्णिम युग था जब चोल, चेर और पाण्ड्य — तीन महान राजवंश — एक साथ फले-फूले। इस काल में तमिल भाषा और साहित्य का अद्भुत विकास हुआ और भारत के पश्चिमी तथा पूर्वी तटों से विदेशी व्यापार अपने चरमोत्कर्ष पर था।
संगम काल का नाम "संगम" से लिया गया है जिसका अर्थ है — विद्वानों की सभा या गोष्ठी। तमिल परम्परा के अनुसार तीन संगम (साहित्यिक अकादमियाँ) हुए जिनमें तमिल कवियों ने एकत्र होकर साहित्य-रचना की। इन्हीं संगमों में रचित साहित्य से हमें इस काल के राजवंशों, समाज, व्यापार और संस्कृति की जानकारी मिलती है।
संगम साहित्य में "पत्तुप्पाट्टु" (दस गीत), "एट्टुत्तोकै" (आठ संग्रह), "पतिनेन्कीलक्कणक्कु" (अठारह लघु ग्रंथ) और "तिरुक्कुरल" जैसी अमर रचनाएँ शामिल हैं। "तिरुक्कुरल" को तमिल का बाइबल कहा जाता है और इसके रचयिता तिरुवल्लुवर हैं।
क्षेत्र: तंजावुर, कावेरी नदी
राजधानी: उरैयूर, पुहार
क्षेत्र: केरल, पश्चिमी तट
राजधानी: वांजि
क्षेत्र: मदुरई, दक्षिणी तट
राजधानी: मदुरई
चोल वंश दक्षिण भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली और प्रसिद्ध राजवंशों में से एक है। संगम काल में चोलों का राज्य कावेरी नदी के उपजाऊ डेल्टा क्षेत्र में स्थित था। उनकी प्राचीन राजधानी उरैयूर थी और प्रसिद्ध बन्दरगाह-नगर पुहार (कावेरीपट्टनम) उनका प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था।
संगम काल के चोल शासकों में करिकाल सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। उनका नाम "करिकाल" का अर्थ है — जले हुए पैर वाला। एक किंवदन्ती के अनुसार बचपन में आग में उनके पैर जल गए थे, इसलिए यह नाम पड़ा। करिकाल ने अपने राज्य का विस्तार किया और कावेरी नदी के किनारे एक विशाल बाँध का निर्माण करवाया जो आज भी "ग्रैंड एनीकट" के नाम से जाना जाता है। यह प्राचीन भारत की महानतम अभियांत्रिकी उपलब्धियों में से एक है।
करिकाल ने "वेण्णि के युद्ध" में चेर और पाण्ड्य राजाओं को पराजित किया। उनके शासनकाल में पुहार बन्दरगाह से रोम, अरब और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ समृद्ध व्यापार होता था। चोलों का प्रतीक चिह्न "बाघ" था और उनका झण्डा भी बाघ का था।
चेर वंश का राज्य आधुनिक केरल और तमिलनाडु के पश्चिमी भाग में स्थित था। पश्चिमी तट पर स्थित होने के कारण चेरों का अरब और रोम के साथ समृद्ध व्यापार होता था। उनकी राजधानी "वांजि" थी और प्रमुख बन्दरगाह "मुजिरिस" (तोण्डि) था।
संगम काल के प्रमुख चेर शासकों में उदियन चेरलातन और नेदुञ्जेरल आदन उल्लेखनीय हैं। उदियन चेरलातन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने महाभारत युद्ध में दोनों पक्षों के सैनिकों को भोजन कराया था। यह उनकी उदारता का प्रतीक माना जाता है। नेदुञ्जेरल आदन ने अरब और यवन (यूनानी) व्यापारियों से सम्पर्क बनाए रखा।
चेरों के राज्य में काली मिर्च, इलायची और अन्य मसालों का प्रचुर उत्पादन होता था जो रोमन साम्राज्य में अत्यंत मूल्यवान माने जाते थे। इसीलिए रोमन सम्राट ऑगस्टस के समय से चेर बन्दरगाहों पर रोमन व्यापारियों की बस्तियाँ बसी थीं।
पाण्ड्य वंश का राज्य तमिलनाडु के दक्षिणी भाग में स्थित था। उनकी राजधानी मदुरई थी जो आज भी एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केन्द्र है। पाण्ड्यों का प्रतीक "मछली" था। उनके पास मन्नार की खाड़ी में मोती की खेती के क्षेत्र थे जो अत्यंत मूल्यवान थे।
पाण्ड्य राजाओं ने मदुरई में संगम सभाओं को संरक्षण दिया। "मदुरई" शब्द का अर्थ ही है — "मधुर" (संस्कृत से)। यहाँ तमिल कवियों की प्रसिद्ध साहित्यिक अकादमी थी। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने भी पाण्ड्य राज्य का उल्लेख किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पाण्ड्य राज्य की मोती-सम्पदा का वर्णन मिलता है।
नेदुञ्जेलियन पाण्ड्य काल के सर्वाधिक प्रसिद्ध राजा थे। उन्होंने "तलैयालंगानम के युद्ध" में चोल और चेर राजाओं को एक साथ पराजित किया। उनकी वीरता के गीत संगम साहित्य में अमर हैं।
संगम काल में दक्षिण भारत की अर्थव्यवस्था अत्यंत समृद्ध थी। कृषि, पशुपालन, मत्स्यपालन और विदेशी व्यापार इसके प्रमुख आधार थे। रोम के साथ व्यापार विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण था।
| निर्यात | आयात | प्रमुख बन्दरगाह |
|---|---|---|
| काली मिर्च, मसाले | सोना, चाँदी | पुहार (चोल) |
| हाथीदाँत, मोती | शराब (रोमन) | मुजिरिस (चेर) |
| कपास, रेशम | घोड़े (अरब) | कोर्कई (पाण्ड्य) |
| रत्न, संगमरमर | ताँबे के बर्तन | तोण्डि (चेर) |
संगम काल का तमिल समाज "तिणै" (पाँच भौगोलिक क्षेत्रों) में विभाजित था — कुरिञ्जि (पहाड़), मुल्लै (जंगल), मरुतम् (कृषि भूमि), नेय्तल (समुद्र तट) और पालै (मरुस्थल)। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशेष संस्कृति, प्रेम-भावनाएँ और काव्य-परम्परा थी।
संगम समाज में स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक थी। अनेक महिला कवियित्रियाँ हुईं जिनमें "अव्वैयार" सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। उनकी रचनाएँ आज भी तमिल बच्चों को पढ़ाई जाती हैं। संगम काल में नायक-नायिका भेद की एक विशिष्ट काव्य-परम्परा थी।
तीसरी-चौथी शताब्दी ई. में संगम काल का पतन हुआ। कलभ्र नामक जनजाति के आक्रमण ने तीनों राजवंशों को कमजोर कर दिया। इस काल को "अन्धकार युग" (Dark Age of South India) कहा जाता है क्योंकि इस समय के बारे में ऐतिहासिक जानकारी बहुत कम है। बाद में पल्लव, चालुक्य और राष्ट्रकूट वंशों ने दक्षिण भारत में नई शक्तियाँ स्थापित कीं।
संगम काल दक्षिण भारत के इतिहास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अध्याय है। चोल, चेर और पाण्ड्य — इन तीन राजवंशों ने दक्षिण भारत को राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध किया। संगम साहित्य तमिल भाषा की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं का संग्रह है जो उस काल के जीवन का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। रोम, अरब और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ समृद्ध व्यापार दक्षिण भारत की अन्तर्राष्ट्रीय पहचान का प्रमाण था।

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