भारत के दक्षिण-पूर्व एशिया से सम्बन्ध
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| Ancient India & South East Asia Relations |
B.A. Semester-II · प्राचीन भारतीय इतिहास · India's Relation with South-East Asia
प्राचीन भारत का दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्ध था। व्यापार, धर्म, भाषा, कला और स्थापत्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति का प्रसार इन देशों में हुआ। इसे "भारतीयकरण" (Indianisation) या "सांस्कृतिक विस्तार" कहा जाता है। आज भी म्यांमार, थाईलैंड, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया, मलेशिया और वियतनाम में भारतीय संस्कृति के अमिट चिह्न देखे जा सकते हैं।
भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सम्पर्क के अनेक कारण थे। व्यापारिक दृष्टि से भारत से मसाले, सोना, कपास और रत्न दक्षिण-पूर्व एशिया से आते थे। धार्मिक दृष्टि से बौद्ध और हिन्दू भिक्षु और पुरोहित इन देशों में जाते थे। राजनीतिक दृष्टि से भारतीय राजाओं ने कभी-कभी इन देशों में उपनिवेश भी स्थापित किए। सांस्कृतिक दृष्टि से भारतीय भाषा, लिपि, कला और दर्शन इन देशों को अत्यंत आकर्षक लगते थे।
दक्षिण-पूर्व एशिया में हिन्दू और बौद्ध — दोनों धर्मों का प्रसार भारत से हुआ। प्रारम्भ में हिन्दू धर्म अधिक प्रभावशाली था परन्तु बाद में बौद्ध धर्म ने उसका स्थान ले लिया। आज भी थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, कम्बोडिया और लाओस में बौद्ध धर्म प्रमुख है। इन्डोनेशिया में बाली द्वीप पर हिन्दू धर्म आज भी जीवित है।
संस्कृत भाषा और देवनागरी से मिलती-जुलती लिपियाँ दक्षिण-पूर्व एशिया में फैलीं। थाई, बर्मी, खमेर और जावानी लिपियाँ भारतीय लिपि से ही विकसित हुई हैं। इन देशों के अनेक शब्द संस्कृत से लिए गए हैं। "सुवर्णभूमि" (सोने की भूमि) इस क्षेत्र का संस्कृत नाम था।
अंगकोर वाट (कम्बोडिया) और बोरोबुदुर (इण्डोनेशिया) विश्व की महानतम स्थापत्य कृतियों में से हैं और दोनों भारतीय कला की देन हैं। अंगकोर वाट भगवान विष्णु को समर्पित है और 12वीं शताब्दी में बना। बोरोबुदुर बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा मन्दिर है।
| भारतीय तत्त्व | दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रभाव |
|---|---|
| हिन्दू धर्म | अंगकोर वाट, बाली का हिन्दू समाज |
| बौद्ध धर्म | बोरोबुदुर, थाईलैंड/म्यांमार में बौद्ध मठ |
| रामायण | रामकियेन (थाई), रामायण (बाली), काकाविन रामायण (जावा) |
| संस्कृत | खमेर, थाई, जावानी में संस्कृत शब्द |
| स्थापत्य | शिखर शैली के मन्दिर पूरे क्षेत्र में |
भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के सम्बन्ध इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक आदान-प्रदानों में से एक हैं। भारत ने इन देशों को धर्म, भाषा, कला और प्रशासन की व्यवस्था दी। यह "सांस्कृतिक साम्राज्यवाद" नहीं था बल्कि स्वेच्छा से हुआ सांस्कृतिक प्रवाह था। अंगकोर वाट और बोरोबुदुर आज भी इस महान सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं।

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